दुनिया के मंच पर दिखी ‘In Which Annie Gives It Those Ones’ की दमदार वापसी, अरुंधति रॉय की गैरमौजूदगी पर क्या है कहानी?
हाल ही में, भारतीय फिल्म ‘In Which Annie Gives It Those Ones’ की रिस्टोर्ड (संशोधित) कॉपी को विश्व प्रसिद्ध बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल यानी बर्लिनाले में प्रदर्शित किया गया। इस खास मौके पर फिल्म के संरक्षणकर्ता और फिल्म विशेषज्ञ शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने इस फिल्म को पुनः जीवंत किया। लेकिन, इस मौके पर साहित्य और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी। शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने स्पष्ट किया कि अरुंधति रॉय की गैरमौजूदगी ने उन्हें आहत नहीं किया।
पृष्ठभूमि क्या है?
‘In Which Annie Gives It Those Ones’ एक महत्वपूर्ण हिंदी फिल्म है, जिसे पहली बार 1989 में रिलीज़ किया गया था। इस फिल्म की कहानी इंजीनियरिंग शिक्षा प्रणाली के इर्द-गिर्द घूमती है और इसमें हास्य और आलोचनात्मक नजरिए का समावेश है। अरुंधति रॉय इस फिल्म की सह-लेखिका हैं, जिन्होंने बाद में विश्वविख्यात उपन्यास ‘द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स’ से साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई।
फिल्म का संरक्षण और उसकी रिस्टोरेशन की प्रक्रिया में शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने इस फिल्म को डिजिटल रूप में सुधार कर नई पीढ़ी के दर्शकों तक पहुंचाने की पहल की। बर्लिनाले में इसका प्रदर्शन भारतीय सिनेमा की विरासत को सम्मानित करने वाला एक प्रयास था।
पहले भी ऐसा हुआ था?
अरुंधति रॉय का फिल्म उद्योग से एक सीमित जुड़ाव रहा है, और वे हमेशा विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर अपनी सक्रियता के लिए जानी जाती हैं।
- उनके गैर-मौजूद रहने की खबरें पहले भी सामाजिक एवं साहित्यिक आयोजनों में सुनी जाती थीं।
- फिल्मों के रिस्टोरेशन्स और पुरानी फिल्में नए मंचों पर लाई जाती रहती हैं, पर सभी मूल कारीगरों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं होती।
फिल्म इंडस्ट्री पर असर
एक क्लासिक फिल्म की पुनः प्रस्तुति भारतीय सिनेमा के महत्व और इतिहास पर प्रकाश डालती है। इस प्रकार की पहल पुरानी फिल्मों और कलाकारों को नई जीवन शक्ति देती है, जो युवा दर्शकों को उनकी विरासत से जोड़ती है।
अरुंधति रॉय की अनुपस्थिति के बावजूद, फिल्म के संरक्षण और पुनरुद्धार को उद्योग में सकारात्मक रूप से देखा गया है। यह सिलसिला भारतीय सिनेमा में यादगार कृतियों को सहेजने और प्रदर्शित करने की दिशा में एक प्रेरणा साबित होता है।
आगे क्या हो सकता है?
- भविष्य में ऐसी कई फिल्मों की रिस्टोरेशन और प्रदर्शन की संभावना बनी रहेगी, जिससे भारतीय सिनेमा के इतिहास को संरक्षित और बढ़ावा मिलेगा।
- शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर जैसे संरक्षणकर्ताओं की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होती जाएगी।
- अरुंधति रॉय जैसे व्यक्तित्व की उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है, पर उनकी सामाजिक और साहित्यिक प्रतिबद्धताएँ भी समझी जानी चाहिए।
- इंडस्ट्री को चाहिए कि वे मूल कारीगरों को अधिक शामिल करें, जिससे उनकी आत्मीयता बनी रहे।
- डिजिटल युग में फिल्म संरक्षण के नए तरीके और अवसर भारतीय सिनेमा की विरासत को और सुचारू रूप से सुरक्षित रखने में मदद करेंगे।
निष्कर्षतः, ‘In Which Annie Gives It Those Ones’ की बर्लिनाले में वापसी भारतीय सिनेमा के लिए गर्व का विषय है, और इसने दर्शाया कि कैसे पुरानी फिल्में आज भी प्रासंगिक और प्रभावशाली हो सकती हैं।
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