अरुंधति रॉय ने बर्लिन फिल्म फेस्टिवल छोड़कर उठाए बड़े सवाल, क्या बदलेंगे देश-दुनिया के नजरिए?
अरुंधति रॉय ने हाल ही में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल छोड़कर कई गंभीर और महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। उनका यह कदम न केवल एक सांस्कृतिक बयान था बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी था।
अरुंधति रॉय का तर्क
अरुंधति रॉय का कहना है कि फिल्म फेस्टिवल जैसे मंचों पर सिर्फ कला का प्रदर्शन ही नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां, जैसे कि राजनीतिक दमन, मानवाधिकारों का हनन, और पर्यावरणीय संकट, सभी पर ध्यान देना आवश्यक है।
उठाए गए मुख्य सवाल
- क्या सांस्कृतिक कार्यक्रम केवल मनोरंजन के लिए हैं या उनका उद्देश्य समाज में जागरूकता लाना भी है?
- क्या देश-दुनिया के नजरिए में बदलाव की जरूरत है ताकि हम न्याय और समानता की दिशा में आगे बढ़ सकें?
- क्या हम अपने दायित्वों को पहचान रहे हैं जो कि कला और संस्कृति के जरिए समाज को सकारात्मक दिशा दे सकते हैं?
संभावित प्रभाव
अरुंधति रॉय के इस कदम से उम्मीद है कि देश-दुनिया के नजरिए में बदलाव आएगा और लोग केवल मनोरंजन के बजाय गंभीर मुद्दों पर ध्यान देंगे। इससे सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर और अधिक खुले और निष्पक्ष संवाद की शुरुआत हो सकती है।
यह भी संभव है कि अन्य कलाकार और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनकर्ता भी इस दिशा में कदम उठाएं और अपने मंचों का इस्तेमाल सामाजिक न्याय और बदलाव के लिए करें।